सारांश :
7 अक्टूबर 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिवसीय बैठक के बाद नई ब्याज दरों की घोषणा करेंगे। माना जा रहा है कि आरबीआई रेपो रेट को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर सकता है। यदि यह वृद्धि होती है तो 4 साल बाद होम, ऑटो और पर्सनल लोन की ईएमआई महंगी होने की संभावना है।
तीन दिवसीय एमपीसी बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा करेंगे ऐलान
अगर आप घर, गाड़ी या किसी व्यक्तिगत आवश्यकता के लिए बैंक से लोन लेने की योजना बना रहे हैं, तो आने वाले दिनों में आपके ऊपर वित्तीय बोझ बढ़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिनों तक चली समीक्षा बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा आज, 7 अक्टूबर को नई ब्याज दरों का ऐलान करेंगे। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्रीय बैंक रेपो रेट को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% करने का निर्णय ले सकता है। यदि यह बढ़ोतरी लागू होती है, तो पिछले 4 वर्षों में यह पहला मौका होगा जब रेपो दर में इजाफा देखा जाएगा। हालांकि, सभी वाणिज्यिक बैंक अपनी परिचालन लागत और बाजार की स्थिति के आधार पर दरों में मामूली बदलाव कर सकते हैं।
क्या होता है रेपो रेट और आपकी ईएमआई पर कैसे पड़ता है असर?
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को कम अवधि के लिए कर्ज देता है। इसी दर को आधार मानकर बैंक अपने ग्राहकों के लिए लोन की ब्याज दरें तय करते हैं। यदि रेपो रेट बढ़ता है तो बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है, जिसके चलते वे अपने लोन की दरें बढ़ा देते हैं और ग्राहकों की ईएमआई (EMI) बढ़ जाती है। इसके विपरीत, रेपो रेट घटने पर लोन सस्ते होने और ईएमआई कम होने की संभावना बनती है। रेपो रेट का सीधा संबंध महंगाई नियंत्रण से भी है; जब महंगाई बढ़ती है, तो आरबीआई रेपो रेट में बढ़ोतरी करके बाजार में नकदी और खर्च को सीमित करने का प्रयास करता है, जिससे महंगाई पर अंकुश लगाया जा सके।
वर्ष 2026 की पिछली तीन बैठकों में स्थिर रखी गई थीं दरें
उल्लेखनीय है कि चालू वर्ष 2026 में आरबीआई की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की अब तक तीन बैठकें हो चुकी हैं। अप्रैल, जून और अगस्त 2026 में आयोजित इन तीनों बैठकों के दौरान केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25% के स्तर पर ही स्थिर रखा था। लगातार तीन बैठकों में दरों को अपरिवर्तित रखने के बाद अब चौथे समीक्षा चक्र में रेपो रेट में वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।
प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी है रेपो व्यवस्था की ऐतिहासिक शुरुआत
रेपो रेट का इतिहास प्रथम विश्व युद्ध (वर्ष 1917) के दौर से जुड़ा हुआ है। उस समय अमेरिका में बैंकों पर टैक्स का बोझ बढ़ जाने के कारण कर्ज लेना महंगा हो रहा था। टैक्स के प्रभाव से बचने और बैंकों को तरलता प्रदान करने के उद्देश्य से फेडरल रिजर्व ने रेपो सिस्टम की शुरुआत की थी। प्रारंभ में इसमें केवल सदस्य बैंक शामिल थे, जिसके बाद 1950 के दशक में प्राइमरी डीलरों को जोड़ा गया। समय के साथ इसके नियमों में बदलाव आया; जहां पहले यह फिक्स्ड डिस्काउंट रेट पर निर्भर था, वहीं बाद में इसे बाजार दरों से जोड़ा गया और वर्तमान में अमेरिका की FOMC कमेटी इसे तय करती है। पहले इसमें सरकारी व वार बॉन्ड्स गिरवी रखे जाते थे, जबकि 1999 के बाद मॉर्गेज से जुड़े बॉन्ड्स भी स्वीकार किए जाने लगे। आज यह वैश्विक बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी को नियंत्रित करने का सबसे अहम जरिया बन चुका है।