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उत्तराखंड में 3 दिन बाद फिर हिली धरती : 3.7 की तीव्रता से कांपा पिथौरागढ़

संक्षेप (Brief)

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में रविवार दोपहर 3.7 तीव्रता का भूकंप आया। इसका केंद्र जमीन से 11 किमी नीचे बताया जा रहा है। राहत की बात यह है कि किसी नुकसान की खबर नहीं है। इससे 3 दिन पहले 22 अक्टूबर को सीमा से सटे तिब्बत में 7.0 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था, जिसमें 16 लोगों की मौत हुई थी। अक्टूबर महीने में उत्तराखंड में यह चौथी बार भूकंपीय गतिविधि दर्ज की गई है।

उत्तराखंड में 20 दिनों के भीतर चौथी बार महसूस किए गए भूकंप के झटके

पिथौरागढ़ में रविवार दोपहर करीब 3.7 तीव्रता का भूकंप महसूस किया गया। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भूकंप का केंद्र पिथौरागढ़ से लगभग 7 किलोमीटर पूर्व में जमीन से 11 किलोमीटर की गहराई पर स्थित था। घटना में फिलहाल किसी भी तरह के जानमाल के नुकसान की सूचना नहीं मिली है।

अक्टूबर महीने के दौरान उत्तराखंड में भूकंप की यह चौथी मुख्य घटना दर्ज की गई है। इससे पहले 6 अक्टूबर को चमोली में 4.9 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके झटके राज्य के सभी 13 जिलों में महसूस किए गए थे। इसके बाद 10 अक्टूबर को बागेश्वर में 2.8 और उत्तरकाशी में 4.2 तीव्रता के झटके आए थे। महज 20 दिनों के भीतर राज्य के चार अलग-अलग जिलों में इस तरह की भूगर्भीय हलचल सामने आई है।

तिब्बत में 7.0 तीव्रता का भीषण भूकंप, 16 लोगों की मौत और भारी तबाही

इससे तीन दिन पूर्व, 22 अक्टूबर की रात लगभग 10:33 बजे (चीन के स्थानीय समय अनुसार) उत्तराखंड सीमा से सटे तिब्बत क्षेत्र में 7.0 तीव्रता का प्रचंड भूकंप आया था। इस भूकंप का केंद्र ल्हासा से लगभग 400 किलोमीटर दूर नागक्यू शहर के बाछेन इलाके में बताया गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस आपदा में 16 लोगों की जान चली गई, जबकि घायलों की संख्या 76 तक पहुंच गई। भूकंप के कारण 330 से अधिक मकान क्षतिग्रस्त या ढह गए, जिसके बाद प्रभावित क्षेत्रों से 12 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया गया। इस मुख्य भूकंप के बाद अगले दिन सुबह तक 400 से अधिक आफ्टरशॉक (भूकंप के बाद के झटके) दर्ज किए गए।

IIT बॉम्बे समेत कई संस्थानों का शोध: हिमालय के नीचे लॉक है 115 KM चौड़ा हिस्सा

हाल ही में IIT बॉम्बे, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में उत्तराखंड हिमालय को लेकर अहम जानकारियां सामने आई हैं।

रिसर्च के मुताबिक, हिमालय के नीचे मौजूद 'मेन हिमालयन थ्रस्ट' (MHT) का करीब 115 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा मजबूती से लॉक स्थिति में है। भारतीय टेक्टोनिक प्लेट हर साल लगभग 20 मिलीमीटर की गति से यूरेशियाई प्लेट के नीचे खिसक रही है, लेकिन घर्षण के कारण फॉल्ट का कुछ हिस्सा उसी अनुपात में आगे नहीं बढ़ पाता। वैज्ञानिकों ने यहां हर साल 18 मिलीमीटर 'स्लिप डेफिसित' का अनुमान लगाया है, जिससे चट्टानों के बीच भूगर्भीय तनाव जमा हो रहा है। वैज्ञानिकों ने 300 किमी लंबे क्षेत्र में एक सदी में जमा ऊर्जा को 8.1 तीव्रता के भूकंप के बराबर आंका है, हालांकि इसे किसी आगामी भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।

सैटेलाइट आंकड़ों से उजागर हुई जमीन के उठने और धंसने की हलचल

वैज्ञानिकों ने 4 जुलाई 2015 से 22 जून 2024 के बीच जापान के ALOS-2 सैटेलाइट से प्राप्त 55 रडार दृश्यों और 130 GNSS स्टेशनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया।

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु के शोधकर्ता डॉ. दिव्यशक्ति पांडा के अनुसार, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जमीन हर साल लगभग 4 से 6 मिलीमीटर ऊपर उठ रही है, जबकि निचले व बाहरी हिमालय के कुछ हिस्सों में जमीन धंसने के संकेत मिले हैं। फॉल्ट लॉक होने के कारण जब जमा हुआ तनाव अचानक मुक्त होता है, तो भूकंप की स्थिति बनती है। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस डेटा के आधार पर भूकंप की सटीक तारीख या तीव्रता की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

मध्य हिमालय में लंबे समय से बड़े भूकंप का न आना चिंताजनक: विशेषज्ञ

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व भू-वैज्ञानिक डॉ. अजय पॉल ने बताया कि GPS और सैटेलाइट डेटा से भूगर्भीय ऊर्जा का आकलन किया जा रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि 1905 के कांगड़ा और 1934 के बिहार-नेपाल भूकंप के बाद से मध्य हिमालयी क्षेत्र में लंबे समय से 8 से अधिक तीव्रता का बड़ा भूकंप नहीं आया है, जिससे तनाव का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि लंबे अंतराल का मतलब यह नहीं है कि तुरंत बड़ा भूकंप आएगा। उत्तराखंड के संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि भूकंपरोधी निर्माण, पुरानी इमारतों की सुरक्षा जांच और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को सुदृढ़ किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

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