संक्षिप्त विवरण
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवक द्वारा रिश्वत मांगने के आरोपों की जांच के लिए पूर्व मंजूरी लेना आवश्यक नहीं है। अदालत ने इसे आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा मानने से इनकार करते हुए राजस्थान के कांस्टेबल तेजाराम की याचिका खारिज कर दी है।
रिश्वत मांगना आधिकारिक कर्तव्य नहीं, लोक सेवकों को नहीं मिलेगा कानूनी संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यदि किसी लोक सेवक पर रिश्वत मांगने का आरोप लगता है, तो उसकी जांच या पूछताछ शुरू करने के लिए सरकार या संबंधित प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि घूस मांगना या अनुचित लाभ स्वीकार करना किसी भी सूरत में आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़ा कार्य नहीं है, इसलिए ऐसे कृत्यों को कानून के तहत कोई सुरक्षा कवच या संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल की याचिका की खारिज
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 16 अक्टूबर को यह अहम फैसला सुनाया। पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस अंजारिया ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस निर्णय को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें सिरोही में तैनात पुलिस कांस्टेबल तेजाराम के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7 के तहत आरोप तय करने के निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया गया था। इसके साथ ही तेजाराम द्वारा अपने खिलाफ तय आरोपों को चुनौती देने वाली अपील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
गबन, धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी जैसे अपराध धारा 17ए के दायरे से बाहर
अदालत ने कांस्टेबल तेजाराम की उस दलील को सिरे से नकार दिया जिसमें उसने दावा किया था कि जांच एजेंसी ने अधिनियम की धारा 17ए के तहत जांच या पूछताछ के लिए पूर्व मंजूरी नहीं ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए साफ किया कि गबन, खातों में हेराफेरी, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और रिश्वत लेने जैसे गंभीर अपराध धारा 17ए के कानूनी संरक्षण के दायरे में बिल्कुल नहीं आते हैं। अधिनियम की धारा-7 (जो 2018 में संशोधित हुई थी) उन लोक सेवकों को दंडित करने का प्रावधान करती है जो सरकारी दायित्व निभाने के बदले अनुचित लाभ स्वीकार करते हैं या प्रयास करते हैं।
जानिए क्या था पूरा मामला और कैसे दर्ज हुई थी शिकायत
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरोपी तेजाराम सिरोही में पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय में तैनात था। 22 अप्रैल 2021 को एक अन्य कांस्टेबल देवेंद्र कुमार ने ई-मेल के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई थी कि तेजाराम ने पुलिस अधीक्षक के नाम पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी।
मामले की पूरी समय-सारणी इस प्रकार है:
- 4 जून 2021: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7ए और भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
- 1 सितंबर 2021: आरोपी कांस्टेबल तेजाराम को गिरफ्तार किया गया।
- 8 दिसंबर 2023: अभियोजन के लिए औपचारिक मंजूरी मिली।
- 19 जनवरी 2024: मामले में चार्जशीट (आरोप-पत्र) दाखिल किया गया।
- 12 सितंबर 2024: पाली की विशेष अदालत ने धारा 7 के तहत तेजाराम पर आरोप तय किए।
- 26 मार्च 2025: राजस्थान हाईकोर्ट ने तेजाराम की पुनरीक्षण याचिका खारिज की, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।