संक्षिप्त विवरण
उत्तराखंड में मानव और वन्यजीवों (जैसे भालू) के बीच लगातार बढ़ते टकराव को रोकने के लिए प्रशासन ने नई रणनीति तैयार की है। इसके तहत राज्य के सभी जिलों में संवेदनशील इलाकों की पहचान कर उनकी मैपिंग की जाएगी। 14 सदस्यीय समिति में वन, कृषि और शिक्षा समेत कई विभाग मिलकर सुरक्षा, एआई कैमरों से निगरानी और जनजागरूकता अभियानों के जरिए इस जोखिम को कम करने का प्रयास करेंगे।
राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए बहु-विभागीय समिति गठित
उत्तराखंड के पहाड़ी और जंगलों से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में इंसानों और जंगली जानवरों के बीच बढ़ता टकराव एक गंभीर समस्या बना हुआ है। इस चुनौती से पूर्व-नियोजित तरीके से निपटने के लिए राज्य सरकार के निर्देशों पर जनपद स्तरीय मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन समिति का गठन किया गया है। यह व्यवस्था केवल घटनाएं होने के बाद कदम उठाने के बजाय संभावित खतरे वाले स्थानों पर पहले से सुरक्षा और रोकथाम के इंतजाम करने पर केंद्रित होगी।
14 विभागों के समन्वय से तैयार होगा सुरक्षा खाका
नई व्यवस्था के तहत अब मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने की जिम्मेदारी केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहेगी। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित इस समिति में कुल 14 सदस्य शामिल किए गए हैं। इनमें मुख्य विकास अधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) के अलावा कृषि, उद्यान, शिक्षा, पशुपालन और नगर निगम जैसे विभिन्न प्रमुख विभागों के अधिकारी शामिल होंगे। चूंकि वन्यजीवों की आवाजाही का असर खेती, ग्रामीण जीवन और जनसुरक्षा पर पड़ता है, इसलिए यह समिति सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर साझा रणनीति बनाएगी।
हॉटस्पॉट मैपिंग, एआई कैमरे और अर्ली वार्निंग सिस्टम से निगरानी
समिति द्वारा जिलों के जंगलों से सटे गांवों, खेतों और आबादी वाले संवेदनशील इलाकों को 'हॉटस्पॉट' के रूप में चिह्नित कर उनकी मैपिंग कराई जाएगी। खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान के बाद तकनीक की मदद से निगरानी बढ़ाई जाएगी, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित कैमरों और अर्ली वार्निंग सिस्टम के इस्तेमाल पर विचार किया जा रहा है। इन आधुनिक तकनीकों के जरिए वन्यजीवों की गतिविधियों की जानकारी समय रहते मिल सकेगी। साथ ही, किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में क्विक रिस्पांस टीम (QRT) की तैनाती की जाएगी।
किसानों और स्कूली बच्चों के लिए विशेष जागरूकता अभियान
मानव-वन्यजीव संघर्ष के जोखिम को कम करने के लिए स्थानीय निवासियों, विशेषकर किसानों और स्कूली बच्चों को सतर्क रहने के लिए जागरूक किया जाएगा। इसके अलावा, जैविक कचरे के उचित निपटान (अपशिष्ट प्रबंधन) और स्थानीय परिस्थितियों में सुधार पर काम होगा, जिससे वन्यजीवों के आबादी वाले क्षेत्रों में आने के कारणों को समाप्त किया जा सके।
अधिकारियों को निर्देश जारी, संयुक्त प्रयासों पर जोर
प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (PCCF) वाइल्डलाइफ नीना ग्रेवाल के अनुसार, सभी जिलों में संबंधित विभागों के संयुक्त प्रयासों से मानव-वन्यजीव संघर्ष के खतरों को कम करने की दिशा में काम किया जाएगा। इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए सभी डीएफओ और संबंधित निदेशकों को आधिकारिक पत्र भेज दिए गए हैं, जिससे जिला स्तर पर मैपिंग और सुरक्षा उपायों की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू की जा सके।