संक्षिप्त समाचार
उत्तर प्रदेश में नकली और अधोमानक दवाओं की बिक्री पर रोक लगाने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने नए निर्देश जारी किए हैं। 24 सितंबर 2026 को सामने आई इस रणनीति के तहत अस्पतालों और डॉक्टरों के नाम पर सप्लाई होने वाली दवाओं पर 'इंस्टीट्यूशनल सप्लाई' लिखना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही बिलिंग में गड़बड़ी और दवाओं के अनधिकृत डायवर्जन को रोकने के लिए नए नियम लागू किए गए हैं। विक्रय बिल में “बिल टू” (Bill To) और “शिप्ड टू” (Shipped To) के प्रावधानों के दुरुपयोग पर भी रोक लगाई गई है।
संस्थागत दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त व्यवस्था
उत्तर प्रदेश में नकली, काउंटरफिट और अधोमानक औषधियों की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने एक नई रणनीति तैयार की है। विभाग की आयुक्त डॉ. रोशन जैकब द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, अब डॉक्टर या अस्पताल के नाम पर कंपनी से आपूर्ति होने वाली दवाओं के लेबल और पैकिंग पर निर्माणकर्ता फर्म या सीएफए द्वारा स्पष्ट रूप से 'इंस्टीट्यूशनल सप्लाई' (Institutional Supply) अंकित करना अनिवार्य होगा।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य विशेष छूट पर दी जाने वाली संस्थागत आपूर्ति की दवाओं के दुरुपयोग और उनके अनधिकृत डायवर्जन को रोकना है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद यह पहचानना आसान हो जाएगा कि कौन सी दवा संस्थागत आपूर्ति के लिए है, जिससे उसे सामान्य बाजार में अवैध रूप से नहीं बेचा जा सकेगा। इसके अलावा, कंपनियों, सीएंडएफ एजेंटों, सुपर डिस्ट्रीब्यूटरों और स्टॉकिस्टों को यह निर्देश दिया गया है कि दवा का बिल उसी चिकित्सक या संस्थान के नाम से जारी किया जाए, जिसे वास्तव में दवा भेजी जा रही है। विक्रय बिल में “बिल टू” (Bill To) और “शिप्ड टू” (Shipped To) के प्रावधानों के दुरुपयोग पर भी रोक लगाई गई है।
जानिए कैसे किया जाता था सस्ती और फर्जी दवाओं का खेल
विभाग के अनुसार, औषधि निर्माता एवं विपणनकर्ता कंपनियां अपने सीएंडएफ एजेंटों, सुपर डिस्ट्रीब्यूटरों या स्टॉकिस्टों के माध्यम से डॉक्टरों, अस्पतालों और नर्सिंग होम को विशेष छूट देती हैं। जांच में यह बात सामने आई है कि कई मामलों में कंपनियां या एजेंट दवाओं की बिलिंग संबंधित डॉक्टर या अस्पताल के नाम पर करने के बजाय अपने चहेते स्टॉकिस्ट के नाम पर कर देते थे।
इसके बाद स्टॉकिस्ट द्वारा उन दवाओं को तय अस्पताल या डॉक्टर को देने के बजाय किसी अन्य औषधि विक्रेता या फर्म को सप्लाई कर दिया जाता था, जिससे डॉक्टर के नाम पर आने वाली सस्ती दवा पर स्टॉकिस्ट भारी मुनाफा कमाते थे। इतना ही नहीं, विशेष छूट और सस्ती दवाओं की आड़ में फर्जी बिल तैयार कर नकली और काउंटरफिट दवाओं की बिक्री भी की जा रही थी। हाल ही में चलाए गए अभियानों में इस तरह के कई मामले पकड़े गए हैं, जिसके बाद यह नई गाइडलाइन जारी की गई है।
शेड्यूल एच, एच1 और एक्स दवाओं के लिए पर्चा और क्रय आदेश अनिवार्य
औषधि नियमावली के प्रावधानों का हवाला देते हुए विभाग ने चिकित्सकीय परामर्श पर बेची जाने वाली दवाओं जैसे शेड्यूल एच, एच1 और एक्स (Schedule H, H1, X) की आपूर्ति को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है। निर्देशों के मुताबिक, इन दवाओं की आपूर्ति केवल पंजीकृत चिकित्सक, अस्पताल, डिस्पेंसरी और नर्सिंग होम के लिखित एवं हस्ताक्षरित क्रय आदेश (Purchase Order) पर ही की जाएगी।
कानूनी पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह नियम भी लागू किया गया है कि संबंधित संस्थाओं और विक्रेताओं को इन क्रय आदेशों की प्रति को कम से कम दो वर्ष तक अपने रिकॉर्ड में सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा।