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संयुक्त राष्ट्र ने बदला दुनिया का नक्शा, नए मैप में अफ्रीका बड़ा : अमेरिका-यूरोप छोटे; जानें भारत पर असर

संक्षिप्त खबर: 

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' वाले नए विश्व मानचित्र के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत देशों का वास्तविक क्षेत्रफल और आकार दिखेगा, जिससे अफ्रीका बड़ा और अमेरिका-यूरोप छोटे नजर आएंगे। भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि अमेरिका इसका विरोध करने वाला अकेला देश रहा। यह बदलाव भौगोलिक सीमाओं को नहीं, बल्कि उन्हें दर्शाने के तरीके को बदलेगा। नए नक्शे में, जब भारत की तुलना यूरोप, रूस और कनाडा जैसे उत्तरी देशों से की जाएगी, तो यह उनके मुकाबले कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है।



विस्तृत समाचार:

संयुक्त राष्ट्र में ऐतिहासिक बदलाव और वोटिंग के नतीजे

संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को दुनिया के नक्शे को बदलने वाला एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया गया। अब तक इस्तेमाल हो रहे 'मर्केटर वर्ल्ड मैप' की जगह अब 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' वाले नए नक्शे को मान्यता दी गई है। इस प्रस्ताव के पक्ष में भारत समेत 164 देशों ने वोट किया, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे। अमेरिका इकलौता ऐसा देश रहा जिसने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया। इस नए नक्शे के लागू होने से किसी भी देश की वास्तविक जमीन या अंतरराष्ट्रीय सीमाएं नहीं बदलेंगी, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दर्शाने का तरीका बदल जाएगा। इसके परिणामस्वरूप अफ्रीका पहले से काफी बड़ा नजर आएगा, जबकि यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्से छोटे दिखेंगे।

भारत पर क्या होगा नए नक्शे का असर?

भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और वास्तविक क्षेत्रफल में इस बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि, भारत का नक्शा देखने में थोड़ा अलग और कम खिंचा हुआ दिखाई दे सकता है। चूंकि भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है, इसलिए पुराने नक्शे में भी इसका आकार बहुत ज्यादा नहीं बदलता था। नए नक्शे में, जब भारत की तुलना यूरोप, रूस और कनाडा जैसे उत्तरी देशों से की जाएगी, तो यह उनके मुकाबले कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है।

अमेरिका ने क्यों किया कड़ा विरोध?

अमेरिका ने इस नई पहल की कड़ी आलोचना की है। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहसों के बजाय दुनिया की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने इसे एक वैचारिक एजेंडा करार देते हुए दावा किया कि ऐसी बहसों से संयुक्त राष्ट्र अपनी विश्वसनीयता खो रहा है।

अफ्रीकी देशों की मांग और पुराने नक्शे की खामियां

यह प्रस्ताव टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे द्वारा पेश किया गया था और इसे अफ्रीकी संघ का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। अफ्रीकी देशों का तर्क था कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का आकार काफी छोटा दिखता है, जिससे उनके वैश्विक महत्व, आर्थिक क्षमता और विकास की जरूरतों को लेकर गलत धारणाएं बनती हैं। प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र था। बता दें कि मर्केटर नक्शा 1569 में यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने समुद्री जहाजों की दिशा समझने के लिए बनाया था। इसमें भूमध्य रेखा से दूर वाले इलाके बड़े दिखते हैं। उदाहरण के तौर पर, पुराने नक्शे में 22 लाख वर्ग किलोमीटर वाला ग्रीनलैंड, 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर वाले (यानी 14 गुना बड़े) अफ्रीका के बराबर दिखाई देता है।

फ्रांस का समर्थन और नए विकल्प

संयुक्त राष्ट्र में मतदान से पहले फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-नोएल बारो ने भी इस बदलाव का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि फ्रांस अब 'एकर्ट IV प्रोजेक्शन' का उपयोग करेगा, जिसे 1906 में जर्मन कार्टोग्राफर मैक्स एकर्ट-ग्राइफेंडॉर्फ ने बनाया था। हालांकि एकर्ट IV में क्षेत्रफल सही था लेकिन आकार में विकृति थी, जिसे सुधारने के लिए ही 2018 में 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' लाया गया था ताकि दुनिया अधिक संतुलित दिखे।

क्या यह फैसला सभी पर लागू होगा?

संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि स्कूलों, टेक कंपनियों या प्रकाशकों को पुराना नक्शा हटाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, दिशाओं की सटीकता के कारण समुद्री और हवाई नेविगेशन में मर्केटर नक्शे का इस्तेमाल जारी रह सकता है। अफ्रीकी संघ ने इसे एक अधिक सटीक और बराबरी वाली दुनिया की ओर एक ऐतिहासिक कदम बताया है।

रोचक तथ्य: मैप और मानचित्र की उत्पत्ति

शब्दों के इतिहास की बात करें तो अंग्रेजी का 'मैप' शब्द लैटिन भाषा के 'माप्पा' से आया है, जिसका अर्थ कपड़ा या चादर होता है। वहीं, हिंदी का शब्द 'मानचित्र' संस्कृत से लिया गया है, जो 'मान' (माप) और 'चित्र' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है किसी स्थान को अनुपात के साथ चित्र रूप में दर्शाना।

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