संक्षेप:
उत्तराखंड में मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के अनुसार, 28 सितंबर की रात हरिद्वार ग्रामीण, विकासनगर और गदरपुर में बिना किसी आपत्तिकर्ता के स्वतः हजारों 'फॉर्म-7' जनरेट हुए, जिससे मतदाताओं के नाम कटने का खतरा है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर 3 अक्टूबर 2026 को अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले समाधान न होने पर कोर्ट जाने की चेतावनी दी है।
आधी रात को स्वतः जनरेट हुए फॉर्म, कांग्रेस ने उठाए सवाल
उत्तराखंड में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर कांग्रेस ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर दावा किया है कि 28 सितंबर को दावों और आपत्तियों की समय सीमा खत्म होने के बाद देर रात कई विधानसभा क्षेत्रों में एक स्वचालित प्रक्रिया के तहत हजारों 'फॉर्म-7' जनरेट हुए। इसके जरिए मतदाताओं को 'फॉर्म-10' के नोटिस जारी किए गए। कांग्रेस के अनुसार, निर्वाचन नियम 1960 के नियम 13(2) के तहत फॉर्म-7 किसी वास्तविक आपत्तिकर्ता द्वारा भरा जाना चाहिए। पार्टी के BLA-1 तबरेज आलम और संबंधित ईआरओ (ERO) योगेश महरा के बीच हुई कथित बातचीत के हवाले से बताया गया है कि ईआरओ ने भी स्वतः फॉर्म जनरेट होने की बात स्वीकारी है। संगठन महासचिव राजेंद्र भंडारी ने पूछा है कि बिना वास्तविक आपत्तिकर्ता के इन फॉर्म्स को कैसे वैध माना जा सकता है।
हरिद्वार और अन्य क्षेत्रों में हजारों मतदाताओं पर असर का दावा
पार्टी ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि 28 सितंबर की मध्यरात्रि के बाद हरिद्वार ग्रामीण में 3,503, विकासनगर में 2,444 और गदरपुर में 1,980 मतदाताओं को फॉर्म-7 के जरिए नोटिस जारी किए गए, जबकि नोटिस जारी करने की समय सीमा 13 अगस्त को ही समाप्त हो चुकी थी। हरिद्वार ग्रामीण के सराय क्षेत्र (भाग संख्या 65) का उदाहरण देते हुए कांग्रेस ने बताया कि यहां 407 मतदाताओं को 'Logical Discrepancy' और 'No Mapping' के तहत नोटिस मिला और करीब 123 को विलोपन (नाम हटाने) के लिए दर्शाया गया। स्थानीय BLA-2 नदीम अहमद द्वारा कराए गए सत्यापन के अनुसार, ये सभी मतदाता पात्र हैं और क्षेत्र में ही निवास कर रहे हैं। एसआईआर के व्यापक आंकड़ों के अनुसार, 71.33 लाख ड्राफ्ट वोटरों में से 24.30 लाख को नोटिस मिले थे और 97,173 को अनुपस्थित माना गया था।
'शिकायतकर्ता और निर्णायक एक ही तंत्र', पारदर्शी जांच की मांग
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि यदि चुनाव तंत्र स्वयं फॉर्म-7 तैयार करता है, उसे आपत्ति मानता है, उसकी जांच करता है और फिर नाम हटाता है, तो यह निष्पक्ष सुनवाई और प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। शिकायतकर्ता, जांचकर्ता और निर्णयकर्ता की भूमिका एक ही तंत्र के पास नहीं हो सकती। पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वे किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत दुर्भावना का आरोप नहीं लगा रहे हैं, बल्कि इस प्रक्रिया में उचित जांच और सत्यापन सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि कुछ मतदान केंद्रों के 15 से 20 प्रतिशत मतदाताओं के नाम इस प्रक्रिया से प्रभावित हो सकते हैं।
3 अक्टूबर से पहले समाधान नहीं तो कोर्ट जाने की चेतावनी
कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग के सहायक निर्वाचन अधिकारी के उस सुझाव पर भी आपत्ति जताई है जिसमें कटे हुए नामों को दोबारा 'फॉर्म-6' भरकर जोड़ने की बात कही गई है। पार्टी का तर्क है कि नाम हटाने से पहले ही सुनवाई का उचित अवसर मिलना चाहिए। पत्र के अंत में कांग्रेस ने चुनाव आयोग को चेतावनी दी है कि यदि 3 अक्टूबर 2026 को अंतिम निर्वाचक नामावली के प्रकाशन से पहले इन आपत्तियों और विसंगतियों का पारदर्शी तरीके से समाधान नहीं किया गया, तो पार्टी न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होगी।
