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बुजुर्ग माता-पिता बच्चों को कर सकते हैं संपत्ति से बेदखल : सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि बुजुर्ग माता-पिता सम्मान और सुरक्षा के लिए अपने बच्चों को घर से बेदखल कर सकते हैं। लखनऊ के रवि कांत गुप्ता मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि बढ़ती उम्र का मतलब अपमान या असुरक्षा सहना बिल्कुल नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: सम्मान के साथ जीने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यह स्पष्ट कर दिया कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने ही घर में सुरक्षा और सम्मान के साथ रहने का पूरा कानूनी अधिकार है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के अनुसार, यदि बेटे या बहू के घर में रहने से बुजुर्गों के भरण-पोषण या शांति में किसी तरह की बाधा उत्पन्न होती है, तो वे उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है; बढ़ती उम्र का मतलब अपमान या असुरक्षा के साथ जीना नहीं हो सकता।

लखनऊ के विकास नगर का मामला और कानूनी खींचतान

यह अहम फैसला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता से जुड़े एक पारिवारिक विवाद पर सुनाया गया है। मामले के अनुसार, कथित तौर पर गुप्ता के बेटे के खराब व्यवहार के कारण उनकी 81 वर्षीय मां (गुप्ता की मां) को अपना घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर होना पड़ा था। इस मामले में कार्रवाई करते हुए एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे को मकान से बेदखल करने का आदेश दिया था। बाद में 9 अगस्त 2023 को जिला मजिस्ट्रेट ने भी इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे-बहू को मकान खाली करने को कहा था। इसके खिलाफ बेटे-बहू इलाहाबाद हाईकोर्ट गए, जहां हाईकोर्ट ने यह कहते हुए आदेश रद्द कर दिए कि कानून के तहत ट्रिब्यूनल को बेदखली का अधिकार नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उसी फैसले को पलट दिया है।

2007 के कानून के तहत ट्रिब्यूनल के पास विशेष शक्तियां

सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी स्थिति साफ करते हुए कहा कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' की धारा 7 के तहत गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को धारा 8 के अंतर्गत सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। कानून की धारा 27 सामान्य सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है। ऐसे में कानून के मूल उद्देश्य को पूरा करने और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल जरूरत पड़ने पर बेदखली का आदेश जारी कर सकता है। इस 2007 के कानून का मुख्य लक्ष्य 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के नागरिकों को उपेक्षा और असुरक्षा से बचाना है।

पूर्व के न्यायिक फैसलों का दिया गया हवाला

अपने फैसले को आधार देते हुए शीर्ष अदालत ने 2021 के 'एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर' मामले का भी विशेष रूप से हवाला दिया। इस मामले में भी कोर्ट ने यह माना था कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए यदि जरूरी हो, तो ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। कोर्ट के अनुसार, यही समान कानूनी स्थिति हाल ही में 2025 के 'समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' और 'कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर' मामलों में भी दोहराई गई थी।

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