सारांश
वित्त मंत्रालय ने 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007' की धारा 10A में बदलाव का प्रस्ताव दिया है। इससे भविष्य में UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) दोबारा लागू करने का कानूनी अधिकार सरकार को मिल सकता है। हालांकि, इससे आम यूजर्स पर सीधा असर नहीं पड़ेगा, केवल मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर नीतिगत फैसला लिया जा सकेगा। इससे सरकार बड़े UPI पेमेंट पर शुल्क ले सकेगी।
डिजिटल पेमेंट कानून की धारा 10A में संशोधन की तैयारी
वित्त मंत्रालय ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A को हटाने या उसमें संशोधन करने का प्रस्ताव रखा है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, यह धारा बैंकों और पेमेंट कंपनियों को UPI तथा अन्य डिजिटल माध्यमों से होने वाले पेमेंट पर किसी भी तरह का शुल्क वसूलने से रोकती है। इस नियम में बदलाव के बाद सरकार को यह तय करने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा कि किन डिजिटल पेमेंट मोड्स को मुफ्त रखना है और किन पर शुल्क वसूलने की अनुमति देनी है।
हालांकि, इस संशोधन का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि UPI पेमेंट्स पर तुरंत चार्जेस लागू हो जाएंगे। यह कदम केवल सरकार को भविष्य के लिए नियम और नीतियां बनाने की कानूनी छूट देता है। कानून में बदलाव के बाद सरकार नोटिफिकेशन जारी करके यह तय कर सकेगी कि किस तरह के पेमेंट्स पर फीस लागू होगी और कौन से पेमेंट्स मुफ्त रहेंगे।
जानिए क्या है MDR और 2020 में क्यों हटाया गया था?
जब कोई ग्राहक किसी दुकान पर कार्ड या UPI स्कैन करके पेमेंट करता है, तो उस ट्रांजैक्शन को सुरक्षित तरीके से प्रोसेस करने में बैंक, पेमेंट गेटवे और सॉफ्टवेयर कंपनियों का खर्च आता है। इस सर्विस के बदले व्यापारी (मर्चेंट) से ली जाने वाली फीस को 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (MDR) कहा जाता है।
डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा देने और देश में कैशलेस इकोनॉमी को मजबूत करने के मकसद से सरकार ने जनवरी 2020 में UPI और रुपे डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर MDR को शून्य (जीरो) कर दिया था। इसके बाद से ही देश भर में UPI पेमेंट्स का तेजी से विस्तार हुआ।
क्यों पड़ी कानून बदलने की जरूरत और संसदीय समिति की चिंता
UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक बिना किसी कमाई के चला पाना वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। हाल ही में वित्त पर संसद की स्थाई समिति ने भी इस पर चिंता जताई थी। समिति के अनुसार, जीरो-एमडीआर नीति के कारण पेमेंट इंडस्ट्री और बैंकों को घाटा हो रहा है, जिसकी भरपाई के लिए एक टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल बेहद जरूरी है।
सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रुपे डेबिट कार्ड और कम मूल्य वाले BHIM-UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शंस को सपोर्ट करने के लिए ₹2,000 करोड़ का इंसेंटिव बजट आवंटित किया है। हालांकि, संसदीय समिति ने नोट किया कि यह राशि पेमेंट इंडस्ट्री की वास्तविक लागत का बहुत छोटा हिस्सा ही कवर कर पाती है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य आम जनता के लिए किफायती डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को बनाए रखने के साथ-साथ बैंकों और फिनटेक कंपनियों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाना है।
भविष्य में क्या असर होगा और आम यूजर्स के लिए काम की बात
कानूनी संशोधन पारित होने के बाद स्थिति की समीक्षा की जाएगी। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि बड़े मर्चेंट्स या उच्च मूल्य वाले ट्रांजैक्शंस के लिए चरणबद्ध तरीके से मामूली MDR लागू किया जा सकता है, जबकि छोटे दुकानदारों और आम कंज्यूमर पेमेंट्स को फ्री ही रखा जाएगा।
आम नागरिकों को घबराने की जरूरत नहीं है। अगर भविष्य में MDR वापस भी आता है, तो नियम के अनुसार इसका शुल्क व्यापारी को देना होता है, ग्राहक को नहीं। इसके अलावा, आम लोगों का व्यक्तिगत UPI ट्रांसफर (पर्सन टू पर्सन) पूरी तरह मुफ्त ही रहेगा।