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गवाहों के बयानों में पुलिस नहीं कर सकेगी हेरफेर : यूपी डीजीपी राजीव कृष्णा ने जारी किए सख्त निर्देश


संक्षिप्त विवरण: 

उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्णा ने 17 अगस्त 2026 को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि विवेचना के दौरान पुलिस गवाहों के बयानों में अपनी तरफ से कोई शब्द नहीं जोड़ेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश के बाद यह फैसला लिया गया। इसके अलावा, पासपोर्ट सत्यापन में आपराधिक मामले छिपाने वाले पुलिसकर्मियों पर भी कड़ी कार्रवाई होगी।


गवाहों की अपनी भाषा में दर्ज होंगे बयान, नहीं पूछे जाएंगे सूचक सवाल

यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब विवेचना (इन्वेस्टिगेशन) के दौरान जांच अधिकारी गवाहों के बयानों में अपनी मर्जी से कोई भी शब्द नहीं जोड़ सकेंगे। डीजीपी राजीव कृष्णा ने प्रदेश के सभी पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि गवाह जिस बोली या भाषा में घटना की जानकारी देंगे, बयान हूबहू उसी रूप में दर्ज किया जाएगा। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 के तहत, विवेचक कोई भी ऐसा सूचक सवाल नहीं पूछेंगे जिसका मकसद आरोपी के खिलाफ जबरन तथ्य उगलवाना या आरोप गढ़ना हो। जरूरत पड़ने पर केवल स्पष्टीकरण के लिए सवाल पूछे जा सकते हैं, लेकिन गवाह को किसी भी उत्तर का सुझाव नहीं दिया जाएगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार के बाद डीजीपी का निर्देश

पुलिस विभाग का यह सख्त कदम कथित तौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई 2026 के एक आदेश के अनुपालन में उठाया गया है। दरअसल, 'आतिश उर्फ कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया था कि पीड़ित और उसकी पत्नी के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डेड बयानों तथा लिखित बयानों में बड़ा अंतर था। विवेचक ने वास्तविक कथनों की जगह अपनी तरफ से बातें जोड़ दी थीं। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को अनुचित मानते हुए डीजीपी को दिशा-निर्देश जारी करने को कहा था। इसके तहत अब थानों के जांच अधिकारियों के लिए आपराधिक कानून और बयान दर्ज करने की सही प्रक्रिया पर विशेष कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी। नियमों की अनदेखी पर विवेचक के साथ-साथ पर्यवेक्षण अधिकारी पर भी कार्रवाई होगी।

ई-साक्ष्य एप का इस्तेमाल और फॉरेंसिक जांच अनिवार्य

डीजीपी ने विवेचना में डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग को लेकर भी अहम निर्देश दिए हैं। तलाशी, जब्ती और निरीक्षण के दौरान जुटाए गए सभी डिजिटल सबूत अब 'ई-साक्ष्य एप' पर अपलोड किए जाएंगे और आवश्यकतानुसार उन्हें एफआईआर से लिंक किया जाएगा। इसके अलावा, ऐसे अपराध जिनमें सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, वहां घटनास्थल का फॉरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा निरीक्षण, वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराना अनिवार्य कर दिया गया है।

पासपोर्ट सत्यापन में जानकारी छिपाई तो पुलिसकर्मियों पर गिरेगी गाज

गवाहों के बयानों के अलावा पासपोर्ट पुलिस सत्यापन को लेकर भी कड़े निर्देश जारी हुए हैं। डीजीपी ने राज्य के सभी पुलिस आयुक्तों, एसपी-एसएसपी और थाना प्रभारियों को चेतावनी दी है कि पासपोर्ट सेवा पोर्टल पर रिपोर्ट भेजते समय यदि किसी आवेदक का आपराधिक इतिहास छिपाया गया या गलत/अधूरी रिपोर्ट दी गई, तो संबंधित पुलिसकर्मी और जिम्मेदार अधिकारी पर सख्त कार्रवाई होगी। यह फैसला 'जतिन कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में हाईकोर्ट की नाराजगी के बाद लिया गया है। इस मामले में पुलिस ने 15 जून 2026 को क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को भेजी गई रिपोर्ट में आवेदक के खिलाफ केवल एक केस बताया था, जबकि 2024 में दर्ज एक अन्य केस को छिपा लिया था। अब हर रिपोर्ट में आवेदक पर दर्ज सभी मुकदमों और उनकी वर्तमान स्थिति की पूरी जानकारी देनी अनिवार्य होगी।

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