सारांश
नई दिल्ली: फेस्टिव सीजन से ठीक पहले देश की दिग्गज FMCG और कंज्यूमर कंपनियां लगातार दूसरी तिमाही में अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। कमोडिटी और इनपुट कॉस्ट में इजाफा होने के कारण प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाले टूथपेस्ट, टायर, पेंट, डिटर्जेंट और किचन के जरूरी सामान अब और महंगे होने जा रहे हैं। बता दें, इससे पहले भी इन प्रोडक्ट्स की कीमतों में बढ़ोतरी की गई थी।
मिडिल ईस्ट तनाव और इनपुट कॉस्ट के कारण बढ़ रही हैं कीमतें
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और अमेरिका-ईरान के बीच तनाव के चलते क्रूड ऑयल से जुड़े डेरिवेटिव्स और एनर्जी की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं। इससे आने वाले समय में देश में महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंका जताई गई है। नोमुरा होल्डिंग्स की एशिया मुख्य अर्थशास्त्री सोनल वर्मा के अनुसार, इनपुट कॉस्ट और कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहे भारी दबाव के कारण ग्राहकों पर बढ़ी हुई कीमतों का बोझ डालना मजबूरी बन गया है।
HUL, एशियन पेंट्स और डोडला डेयरी समेत 8 कंपनियां तैयारी में
देश की सबसे बड़ी कंज्यूमर गुड्स कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर निरंजन गुप्ता ने बताया कि क्रूड ऑयल डेरिवेटिव्स में महंगाई के कारण कंपनी होम केयर सेगमेंट, जैसे डिटर्जेंट और डिशवॉशिंग बार की कैटेगरी में सोच-समझकर दाम बढ़ा रही है। HUL के अलावा डोडला डेयरी और एशियन पेंट्स सहित कम से कम 7 अन्य कंपनियां भी कीमतें बढ़ाने का प्लान बना चुकी हैं।
हैवेल्स और टाटा साल्ट पहले ही बढ़ा चुके हैं अपने दाम
एनर्जी की बढ़ती कीमतों के बीच कंपनियों द्वारा होम एप्लायंसेज से लेकर किचन के सामानों पर दूसरी बार दाम बढ़ाने का विचार किया जा रहा है:
- हैवेल्स इंडिया: कंपनी अपने प्रोडक्ट्स की कीमतों में 8% तक की बढ़ोतरी कर चुकी है।
- टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स: टाटा साल्ट की कीमतों में लगभग 7% तक का इजाफा किया जा चुका है।
फेस्टिव सीजन में रिकॉर्ड खरीदारी और मजबूत मांग
अगस्त से नवंबर तक चलने वाले फेस्टिव सीजन, विशेष रूप से दिवाली के दौरान आम लोगों की खरीदारी में भारी उछाल आता है। कई कंपनियों के लिए साल भर की कुल बिक्री का एक-तिहाई (33%) हिस्सा इसी सीजन से आता है। बाजार में मजबूत मांग के चलते कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर आसानी से डाल पा रही हैं।
खुदरा बिक्री और आर्थिक संकेतकों में सुधार
कंपनियों के बयानों के अनुसार, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मांग स्थिर बनी हुई है:
- रिटेल सेल्स: रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सर्वे के अनुसार, जून में रिटेल बिक्री में पिछले साल के मुकाबले 6% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
- आर्थिक संकेतक: द नॉलेज कंपनी के चेयरमैन अरविंद सिंघल के अनुसार, जीएसटी कलेक्शन और हाइवे टोल राजस्व जैसे मजबूत संकेतक बाजार में बेहतर मांग को दर्शाते हैं।
- मांग पर अल नीनो का जोखिम: देवयानी इंटरनेशनल (KFC और Pizza Hut) के चेयरमैन रविकांत जयपुरिया के मुताबिक, मांग स्थिर है लेकिन 'अल नीनो' के जोखिम और कम मानसून का अनुमान यह दर्शाता है कि कंजम्पशन रिकवरी हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती।
जून में महंगाई 4% के पार; RBI की ब्याज दरों पर नजर
जून के महीने में खाने-पीने और ईंधन की लागत बढ़ने से रिटेल महंगाई दर लगभग एक साल में पहली बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के 4% के लक्ष्य से ऊपर निकल गई, हालांकि यह RBI के 2% से 6% के सहनीय दायरे (टॉलरेंस बैंड) के भीतर है। वित्त मंत्रालय ने भी चेतावनी दी है कि महंगाई अब केवल खाद्य पदार्थों तक सीमित न रहकर ग्लोबल फ्यूल कॉस्ट और मौसम के असर से अन्य कंज्यूमर गुड्स पर भी दिख रही है।
RBI का अनुमान है कि मार्च 2027 को खत्म होने वाले वित्त वर्ष में औसत महंगाई दर 5.1% रह सकती है। 3 से 5 अगस्त के बीच होने वाली 6-सदस्यीय मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक में ब्याज दरें स्थिर रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
जानें क्या है 'अल नीनो' और 'इनपुट कॉस्ट'
- अल नीनो: प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक भौगोलिक घटना है। इसके कारण भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे सूखा या कम बारिश का खतरा रहता है। इससे फसलों का उत्पादन घटता है और खाद्य पदार्थ महंगे हो जाते हैं।
- इनपुट कॉस्ट: किसी भी प्रोडक्ट को तैयार करने में लगने वाले कच्चे माल, ईंधन, ट्रांसपोर्टेशन और मजदूरी के कुल खर्च को इनपुट कॉस्ट कहते हैं। लागत बढ़ने पर कंपनियां अपना प्रॉफिट मार्जिन बचाने के लिए अंतिम प्रोडक्ट के दाम बढ़ाती हैं।