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उत्तराखंड सरकार ने शुरू किए 'गुब्बारा क्लिनिक' : टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों को मिलेगा मुफ्त इलाज

सारांश 

बदलती जीवनशैली और कम होती शारीरिक सक्रियता के बीच उत्तराखंड सरकार ने बच्चों में बढ़ते टाइप-1 डायबिटीज के इलाज के लिए प्रदेश के सभी 13 जिलों में एक-एक गुब्बारा क्लिनिक संचालित किया जा रहा है। इसके तहत प्रभावित बच्चों को मुफ्त इलाज, इंसुलिन, डाइट परामर्श और काउंसलिंग दी जा रही है। सरकार ने स्कूलों में स्क्रीनिंग और 2026-27 तक 1,150 पीड़ित बच्चों की सहायता का लक्ष्य रखा है।


उत्तराखंड में बच्चों के मधुमेह इलाज के लिए 'गुब्बारा क्लिनिक' की पहल

उत्तराखंड सरकार ने कम उम्र के बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्यभर में 'गुब्बारा क्लिनिक' (ग्लूकोज उपचार एवं बाल आरोग्य रक्षा अभियान) की शुरुआत की है। पहले इसे देहरादून, हरिद्वार, बागेश्वर और ऊधमसिंहनगर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाया गया था। इसके सफल परिणामों के बाद अब प्रदेश के सभी 13 जिलों में एक-एक गुब्बारा क्लिनिक संचालित किया जा रहा है। इन क्लिनिकों का मुख्य उद्देश्य टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों की समय पर पहचान कर उन्हें निशुल्क इलाज, इंसुलिन थेरेपी, नियमित जांच, डाइट परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करना है।

वर्ष 2026-27 तक 1,150 बच्चों को मिलेगा योजना का लाभ

राज्य सरकार ने वर्ष 2026-27 तक टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित करीब 1,150 बच्चों को गुब्बारा क्लिनिक के माध्यम से लाभ पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप-1 डायबिटीज में थोड़ी सी भी देरी बच्चे की जान के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए सरकार ने उपचार, रोकथाम, परामर्श और फॉलोअप के लिए पूरे प्रदेश में एक समान विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं ताकि बच्चों को बेहतर जीवन जीने में मदद मिल सके।

RBSK के तहत स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में 5 लाख बच्चों की स्क्रीनिंग

बच्चों में डायबिटीज की रोकथाम के लिए पहली बार 'राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम' (RBSK) में टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज स्क्रीनिंग को जोड़ा गया है। इसके तहत प्रदेश के सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों के लगभग पांच लाख बच्चों की नियमित जांच की जाएगी। RBSK की मोबाइल हेल्थ टीम—जिसमें दो आयुष चिकित्सक, एक एएनएम/स्टाफ नर्स और एक फार्मासिस्ट शामिल होंगे—जांच के दौरान लक्षण मिलने पर तुरंत ब्लड शुगर टेस्ट करेगी।

संदिग्ध पाए गए बच्चों को जिला अस्पताल के गैर-संचारी रोग (NCD) क्लिनिक भेजा जाएगा। वहां फास्टिंग ब्लड शुगर, भोजन के दो घंटे बाद ब्लड शुगर और HbA1c जांच से पुष्टि की जाएगी। टाइप-1 डायबिटीज की पुष्टि होने पर इंसुलिन शुरू किया जाएगा, जबकि टाइप-2 और प्री-डायबिटीज वाले बच्चों को जीवनशैली में सुधार की सलाह दी जाएगी।

इन बच्चों को रखा गया है 'हाई-रिस्क' श्रेणी में

सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, निम्नलिखित श्रेणियों के बच्चों को हाई-रिस्क में रखा गया है:

  • मोटापा या अधिक वजन वाले बच्चे

  • शारीरिक रूप से कम सक्रिय बच्चे

  • जंक फूड का अधिक सेवन करने वाले बच्चे

  • पारिवारिक डायबिटीज इतिहास वाले बच्चे

  • जिनकी माताओं को गर्भावस्था में डायबिटीज रही हो

  • पीसीओएस, फैटी लिवर या हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित बच्चे

एम्स ऋषिकेश अध्ययन और एनएचएम के आंकड़े

एम्स ऋषिकेश से जुड़े एक अध्ययन में 16,344 बच्चों की जांच के दौरान 32 बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज पाई गई, जिसका प्रसार अस्पताल स्तर पर 1.95 प्रति 1,000 बच्चे दर्ज किया गया।

इसके अलावा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) उत्तराखंड द्वारा NPCDCS कार्यक्रम के तहत चलाए गए स्क्रीनिंग अभियान में 30 वर्ष से अधिक आयु के 2,34,204 लोगों की जांच की गई। इसमें 1,33,560 लोगों में मधुमेह की पुष्टि हुई, जिन्हें जिला अस्पतालों के माध्यम से इलाज दिया जा रहा है। इस दौरान सबसे अधिक 28,920 मधुमेह रोगी अकेले देहरादून जिले में पाए गए।

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