सारांश
उत्तर प्रदेश में रविवार, 19 जुलाई 2026 को योगी सरकार ने 826 ब्लॉक प्रमुखों को उनके कार्यकाल समाप्ति के साथ ही प्रशासक नियुक्त करने का आदेश जारी कर दिया है। राज्य के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब ग्राम प्रधान, जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख तीनों को एक साथ प्रशासक बनाया गया है। हालांकि, ये प्रशासक आगामी पंचायत चुनावों तक केवल रूटीन काम ही कर सकेंगे और बड़े नीतिगत फैसले लेने पर रोक रहेगी।
यूपी के इतिहास में पहली बार त्रिस्तरीय त्रि-आदेश
उत्तर प्रदेश में एक ऐतिहासिक प्रशासनिक घटनाक्रम के तहत पहली बार जिला पंचायत अध्यक्षों और ग्राम प्रधानों के बाद अब ब्लॉक प्रमुखों को भी प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया गया है। योगी सरकार द्वारा रविवार दोपहर 2 बजे राज्य के सभी 826 ब्लॉक प्रमुखों को प्रशासक बनाने का आधिकारिक आदेश जारी किया गया। गौरतलब है कि इन ब्लॉक प्रमुखों का नियमित कार्यकाल रविवार, 19 जुलाई 2026 को समाप्त हो रहा था। सामान्य प्रक्रियाओं के अनुसार कार्यकाल समाप्त होने के बाद खंड विकास अधिकारी (BDO) को प्रशासक की जिम्मेदारी दी जाती है, परंतु सरकार के इस नए निर्णय के बाद अब मौजूदा ब्लॉक प्रमुख ही आगामी पंचायत चुनाव संपन्न होने तक अपने पदों पर बने रहेंगे। इससे पूर्व सरकार ने 25 मई 2026 को ग्राम प्रधानों को और 11 जुलाई 2026 को सभी 75 जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक नियुक्त करने के आदेश जारी किए थे।
अधिकारों पर बंदिशें और रूटीन कार्यों की अनुमति
तकनीकी और कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए सरकार ने प्रशासक पद पर नियुक्त किए गए ब्लॉक प्रमुखों के अधिकारों को सीमित कर दिया है। इन प्रशासकों को कथित तौर पर कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला लेने का अधिकार नहीं होगा, हालांकि वे सामान्य और रूटीन प्रशासनिक कार्यों को निपटाना जारी रखेंगे। यदि ब्लॉक प्रमुख किसी नीतिगत मामले से जुड़ा कोई प्रस्ताव तैयार करते हैं, तो उन्हें इसे जिला मजिस्ट्रेट (DM) के माध्यम से शासन को भेजना होगा, जहां शासन स्तर पर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि सरकार जल्द ही इनके कार्यों और अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन भी जारी करेगी, जिससे यह साफ हो सके कि वे किन कार्यों को स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं और किनके लिए डीएम की पूर्वानुमति आवश्यक होगी।
राजनीतिक मायने और नेताओं की नाराजगी से बचाव
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पंचायत चुनावों में हो रही देरी के कारण मौजूदा ब्लॉक प्रमुखों और उनके समर्थकों में अपनी राजनीतिक शक्ति और पद छिनने का डर बना हुआ था, जिसे सरकार ने इस फैसले के जरिए दूर करने का प्रयास किया है। राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र नाथ भट्ट के हवाले से बताया गया है कि इस फैसले का सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ-साथ खुद ब्लॉक प्रमुखों को भी मिलेगा। अधिकांश मौजूदा ब्लॉक प्रमुख आगामी पंचायत चुनाव में पुनः स्वयं अथवा अपने पति, पत्नी या भाई-बहन को इस पद पर आसीन कराना चाहते हैं। इस व्यवस्था से उन्हें लगभग छह महीने का अतिरिक्त समय मिल जाएगा, जिसके दौरान वे बीडीसी (BDC) सदस्यों के हस्तक्षेप के बिना अपने क्षेत्र के अधिक से अधिक लोगों के कार्य करवा सकेंगे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी नाराजगी और विधिक पेंच
इस प्रशासनिक फेरबदल के बीच ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का मामला वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है। सहारनपुर निवासी अरविंद राठौर द्वारा दाखिल याचिका पर 26 जून 2026 को सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने पंचायत चुनाव टालने पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने सरकार से सवाल किया था कि प्रधानों को प्रशासक कैसे बनाया गया, क्योंकि यह डिविजन बेंच के आदेश का उल्लंघन है जो अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि 25 और 26 मई 2026 के जिन आदेशों के तहत ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने का प्रयास किया गया, उन्हें पूर्व में ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है, अतः उन्हें प्रशासक रूप में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने चुनाव टालने को असंवैधानिक बताते हुए सरकार से हलफनामे के साथ ओबीसी (OBC) रिपोर्ट और चुनाव कराने की समयसीमा मांगी थी। हालांकि, कोर्ट ने इस व्यवस्था पर फिलहाल कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है।
चुनावों में देरी पर राजनीतिक बयानबाजी
पंचायत चुनावों में हो रही इस देरी को लेकर राज्य में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने चुनावों में हो रही देरी के लिए सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) को जिम्मेदार ठहराया है। राजभर का दावा है कि योगी सरकार समय पर पंचायत चुनाव कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध थी और पंचायती राज विभाग ने इसकी सभी आवश्यक तैयारियां व प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। परंतु, अखिलेश यादव की लीगल सेल के हस्तक्षेप के कारण यह पूरा मामला कानूनी दांव-पेंच और अदालती कार्यवाही में उलझ कर रह गया।