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उत्तराखंड में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी, 71 लाख से अधिक मतदाता शामिल : 19 लाख के रिकॉर्ड में मिली गड़बड़ी

सारांश 
उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मंगलवार को राज्य की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी कर दी है। इस सूची में 71,33,785 मतदाता शामिल हैं, जो वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले लगभग 8.25 लाख कम हैं। विभाग के अनुसार, करीब 19 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में विभिन्न प्रकार की गड़बड़ियां पाई गई हैं और राज्य में 10.39% मतदाताओं का सत्यापन पूरा नहीं हो सका है। 14 जुलाई से 13 अगस्त तक मतदाता सूची में सुधार, नाम जुड़वाने या हटवाने के लिए दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकती हैं।

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में मतदाताओं की संख्या में आई भारी कमी

उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मंगलवार को मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय द्वारा ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित कर दी गई है। जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस बार ड्राफ्ट सूची में कुल 71,33,785 मतदाताओं के नाम दर्ज हैं। यह संख्या वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव की अंतिम मतदाता सूची में शामिल 79.58 लाख मतदाताओं की तुलना में करीब 8.25 लाख कम बताई जा रही है। इसके साथ ही राज्यभर में लगभग 10.39 प्रतिशत मतदाताओं का सत्यापन कार्य पूरा नहीं हो पाया है। अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. विजय कुमार जोगदंडे ने जानकारी दी कि 8 जून से 7 जुलाई के बीच कर्मचारियों द्वारा घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया गया और उनके फॉर्म ऑनलाइन दर्ज किए गए। वर्तमान में यह ड्राफ्ट सूची मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक वेबसाइट ceo.uk.gov.in पर उपलब्ध है, जहां लोग अपने नाम, पते और उम्र की जांच कर सकते हैं।

तीन मैदानी जिलों में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां और सुधार की प्रक्रिया

विभाग के दावों के अनुसार, जारी किए गए 71.33 लाख वोटरों के डाटा में से 19,04,380 मतदाताओं के रिकॉर्ड में अलग-अलग तरह की गड़बड़ियां पाई गई हैं। सबसे अधिक विसंगतियां राज्य के तीन मैदानी जिलों में सामने आई हैं। इस सूची में देहरादून पहले स्थान पर है, जहां कुल 11,90,805 मतदाताओं में से 3,95,868 के रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली है। दूसरे नंबर पर हरिद्वार है, जहां 12,46,219 मतदाताओं में से 3,90,312 वोटरों के रिकॉर्ड में त्रुटियां हैं। वहीं, उधम सिंह नगर (यूएस नगर) में 11,55,672 मतदाताओं में से 3,36,164 के रिकॉर्ड में गड़बड़ियां दर्ज की गई हैं। निर्वाचन विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड त्रुटिपूर्ण हैं, उनकी सुनवाई के लिए न्याय पंचायत स्तर पर क्लस्टर कैंप लगाए जाएंगे। साथ ही मैदानी क्षेत्रों में लोगों की सुविधा के लिए तहसील, नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत और वार्ड स्तर पर विशेष शिविर आयोजित किए जाएंगे।

13 अगस्त तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका

निर्वाचन विभाग का कहना है कि यह अंतिम मतदाता सूची नहीं है, इसलिए मतदाताओं की संख्या में बदलाव होना संभव है। जिन लोगों के नाम छूट गए हैं या कोई गलती है, वे 14 जुलाई से 13 अगस्त तक आवेदन कर सकते हैं। नाम जुड़वाने के लिए फार्म-6, मृत व्यक्ति का नाम हटवाने या आपत्ति के लिए फार्म-7 और विवरण में सुधार के लिए फार्म-8 भरना होगा। वर्तमान में फार्म-6 और फार्म-8 के साथ एनेक्सर-4 लगाना भी अनिवार्य किया गया है। यह प्रक्रिया संबंधित बीएलओ के माध्यम से ऑफलाइन या ECINet ऐप के जरिए ऑनलाइन पूरी की जा सकती है। इन प्राप्त दावों और आपत्तियों का निस्तारण 11 सितंबर तक किया जाएगा, जिसके बाद 15 सितंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी की जाएगी। आयोग के अनुसार, प्रत्येक पात्र मतदाता को अपना पक्ष रखने और सुधार का पूरा अवसर दिया जाएगा।

सीटों के समीकरण और राजनीतिक दलों पर पड़ने वाला संभावित असर

वोटर लिस्ट में होने वाले इन बदलावों का असर आगामी राजनीतिक और चुनावी समीकरणों पर पड़ना तय माना जा रहा है:

  • करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर प्रभाव: वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड की कम से कम 5 सीटों पर हार-जीत का अंतर 1000 वोटों से भी कम रहा था, जिसमें लोहाघाट में 40 वोट और लालकुआं में 175 वोटों से निर्णय हुआ था। ऐसे में नए नाम जुड़ने या हटने से इन सीटों का चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है।
  • डेमोग्राफिक बदलाव और वोट बैंक: पिछले दो दशकों में पहाड़ों से मैदानों की ओर हुए पलायन के कारण देहरादून, ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार और यूपी सीमा से सटे इलाकों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। यदि स्थायी रूप से शिफ्ट हुए लोगों के नाम हटते हैं, तो विधानसभा क्षेत्रों का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बदल सकता है।
  • बूथ स्तर पर राजनीतिक दलों की सक्रियता: अगले दो महीने राजनीतिक दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने बूथ लेवल एजेंट (BLA) सक्रिय कर दिए हैं। दलों के सामने अपने समर्थक मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने और गलत तरीके से नाम कटने से रोकने की बड़ी चुनौती होगी। जिस दल का बूथ नेटवर्क प्रभावी रहेगा, उसे 2027 के चुनाव में शुरुआती बढ़त मिलने की संभावना जताई जा रही है।
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