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सुप्रीम कोर्ट का सीबीएसई बोर्ड की 3 लैंग्वेज पॉलिसी पर रोक से इनकार : कक्षा 9 के छात्रों को अब पढ़नी होंगी 3 भाषाएं

सारांश 

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) की थ्री-लैंग्वेज (छात्रों को तीन भाषा पढ़ाने) पॉलिसी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कोई भी भाषा सीखना कभी बेकार नहीं जाता है। शीर्ष अदालत ने इस नीति को लागू करने में आ रही चुनौतियों को लेकर केंद्र सरकार और सीबीएसई से 10 दिन में जवाब मांगा है। इस नीति के तहत कक्षा 9 के छात्रों के लिए 1 जुलाई 2026 से ही तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है।


सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: नीति पर रोक लगाने से किया साफ इनकार

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) द्वारा लागू की गई थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कोई भी भाषा सीखना कभी बेकार नहीं जाता। इसके साथ ही चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इस नीति को धरातल पर उतारने में आ रही व्यावहारिक चुनौतियों पर सरकार और सीबीएसई से 10 दिन के भीतर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई अब 29 जुलाई को तय की गई है, जिसमें केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को अपना जवाब दाखिल करना होगा।

क्या है सीबीएसई का नया नियम और छात्रों के सामने खड़ी चुनौतियां

दावे के मुताबिक मौजूदा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की गई इस नीति के तहत कक्षा 9 के छात्रों के लिए 1 जुलाई 2026 से तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है। नए नियमों के अनुसार, इन तीन भाषाओं में से कम-से-कम दो भारतीय भाषाओं का होना अनिवार्य है, जबकि विदेशी भाषा को केवल तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में ही चुना जा सकेगा। हालांकि, सीबीएसई ने 6 जून को इस संबंध में एक नई गाइडलाइन जारी करते हुए स्पष्ट किया था कि इस साल 10वीं में पढ़ रहे छात्रों को तीसरी भाषा की परीक्षा नहीं देनी होगी। इसके अलावा 7वीं, 8वीं और 9वीं के वे छात्र जिन्होंने पहले से दो विदेशी भाषाएं चुनी हैं, वे उन्हें जारी रख सकेंगे, लेकिन उन्हें साथ में एक भारतीय भाषा भी पढ़नी होगी। सीबीएसई के अनुसार, कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में तीसरी भाषा (R3) का बोर्ड एग्जाम नहीं लिया जाएगा ताकि छात्रों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां: बुनियादी ढांचे और किताबों की भारी कमी

यह याचिकाएं छात्र यशिका भंडारी, अमनदीप कौर और अर्पण रॉय चौधरी की तरफ से दायर की गई थीं। अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर, सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और गोपाल शंकरनारायणन ने पैरवी की। वकीलों ने दलील दी कि सीबीएसई ने बिना पर्याप्त तैयारी के इस नीति को अचानक लागू कर दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 22 भारतीय भाषाओं में से फिलहाल केवल 3 भाषाओं की ही किताबें उपलब्ध हैं, ऐसे में शेष भाषाओं की पढ़ाई शुरू करना असंभव है। इसके अलावा स्कूलों में नई भारतीय भाषाएं पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों और आवश्यक एकेडमिक इंफ्रास्ट्रक्चर का भारी अभाव है, जिससे छात्रों और शिक्षकों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

नई शिक्षा नीति 2020 का संदर्भ और इसका मुख्य उद्देश्य

संबंधित मामले की पृष्ठभूमि भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूर की गई नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) से जुड़ी है। यह नीति देश में 34 साल बाद शिक्षा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव लेकर आई है, जिसका उद्देश्य छात्रों को 21वीं सदी की जरूरतों के मुताबिक व्यावहारिक ज्ञान और स्किल सिखाना है। इससे पूर्व वर्ष 1986 में शिक्षा नीति बनाई गई थी, जिसे 1992 में अपडेट किया गया था। केंद्र सरकार ने इस नई नीति को पूरी तरह लागू करने के लिए वर्ष 2030 तक का लक्ष्य रखा है। चूंकि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए राज्य और केंद्र सरकार दोनों का इस पर अधिकार होता है। इसके चलते राज्यों के लिए इसे पूरी तरह लागू करना अनिवार्य नहीं है और किसी भी टकराव की स्थिति में आम सहमति से विवाद सुलझाने का सुझाव दिया गया है।

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