उत्तराखंड : करीब 86 साल बाद किशाऊ बांध परियोजना पर बनी सहमति, बिजली मिलेगी लेकिन डूब जाएंगे 17 गांव *CVDS* #640
समाचार संक्षेप (Brief)
नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में करीब 86 साल से लंबित किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना के समझौता ज्ञापन (MoU) पर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच सहमति बन गई है। इस राष्ट्रीय परियोजना के तहत जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार उठाएगी। परियोजना से 6 राज्यों को पानी और बिजली का बड़ा फायदा होगा, हालांकि इसके कारण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुल 17 गांव जलमग्न हो जाएंगे। अब इस प्रोजेक्ट को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष भेजा जाएगा।
छह राज्यों के बीच बनी सहमति और लागत का नया फॉर्मूला
केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुआ ऐतिहासिक फैसला
ब्रिटिश काल के वर्ष 1940 से फाइलों और बैठकों के बीच अटकी किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना अब अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के प्रयासों के तहत एक बड़ी कामयाबी मिली है। नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान इस परियोजना के क्रियान्वयन से जुड़े समझौता ज्ञापन (MoU) पर सहमत हो गए हैं। इस अहम बैठक में केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उपस्थित रहे। इनके अलावा केंद्रीय गृह सचिव, जल शक्ति सचिव, विद्युत मंत्रालय के सचिव सहित दोनों राज्यों के मुख्य सचिव और पीएमओ के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे।
केंद्र सरकार उठाएगी कार्य लागत का 90 फीसदी खर्च
इस बैठक में सबसे महत्वपूर्ण फैसला परियोजना के जल घटक की लागत को लेकर किया गया। नए तय फॉर्मूले के मुताबिक, जल घटक के कार्य की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय सहायता के रूप में वहन किया जाएगा। इसके बाद बचा हुआ 10 प्रतिशत खर्च सभी छह भागीदार राज्यों (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान) द्वारा आपस में साझा किया जाएगा। इसके साथ ही बैठक में यह भी तय हुआ कि हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक की लागत में हिस्सेदारी के बदले, हिमाचल को आवंटित पानी का हिस्सा दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा। केंद्र सरकार का मानना है कि इस कदम से यमुना नदी में स्वच्छ जल का प्रवाह बढ़ेगा और यमुना पुनर्जीवन अभियान को काफी मजबूती मिलेगी। इस MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद अब इसे अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल (कैबिनेट) के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।
जानिए क्या है किशाऊ परियोजना और क्यों 86 वर्षों से अटकी रही फाइल
टोंस नदी पर बनेगा देश का एक सबसे बड़ा बांध
प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर बनाई जानी है, जो कि यमुना की एक प्रमुख सहायक नदी है। यह एक राष्ट्रीय बहुउद्देशीय परियोजना है जिसका मुख्य उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण और यमुना नदी में पर्यावरणीय जल प्रवाह सुनिश्चित करना है। इस कंक्रीट ग्रेविटी बांध की अनुमानित ऊंचाई लगभग 232 से 236 मीटर होगी, जो इसे देश की सबसे बड़ी बांध परियोजनाओं में से एक बनाती है।
साल 1940 से लेकर अब तक का उतार-चढ़ाव भरा इतिहास
किशाऊ परियोजना का इतिहास बेहद पुराना है। इसकी पहली परिकल्पना ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1940 में की गई थी। इसके बाद साल 1944-45 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने इसका सर्वेक्षण कराया, जिसे 1946 में तकनीकी कारणों से रोक दिया गया। इसके बाद साल 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर काम शुरू किया और 1964 में प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (PPR) तैयार कर 1965 में इसे चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में शामिल करने के लिए भेजा।
फॉल्ट लाइन के कारण बदलने पड़े बांध के स्थान
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की समीक्षा में पता चला कि मूल प्रस्तावित स्थल एक प्रमुख भू-वैज्ञानिक फॉल्ट लाइन पर स्थित था, जिससे सुरक्षा का बड़ा जोखिम था। इसके बाद आयोग ने ग्रेविटी आर्च बांध के बजाय रॉकफिल बांध बनाने का सुझाव दिया। उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने दोबारा सर्वे कर 1978 में नई डीपीआर बनाई, लेकिन भूगर्भीय जांच में मूल स्थान रॉकफिल बांध के लिए भी असुरक्षित पाया गया। इसके बाद मूल स्थल को खारिज कर तीन नए स्थानों—अटल, सांबरखेड़ा और मोहराड़ का विस्तृत भू-वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। सुरक्षा मानकों पर सांबरखेड़ा को सबसे उपयुक्त पाया गया और वहां 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाने की सिफारिश की गई।
साल 2008 में मिला राष्ट्रीय दर्जा, 2014 के बाद आई तेजी
सांबरखेड़ा स्थल के आधार पर वर्ष 1988 में नई डीपीआर बनी, जिसमें संशोधन कर 1998 में दोबारा केंद्रीय जल आयोग को भेजा गया। हालांकि, राज्यों के बीच सहमति की कमी, पुनर्वास की चुनौतियों और पर्यावरणीय मंजूरियों के अभाव में यह फाइल दबी रही। इसके बाद साल 2008 में इस प्रोजेक्ट को 'राष्ट्रीय परियोजना' का दर्जा दिया गया, लेकिन अगले 17 वर्षों तक तकनीकी व वित्तीय अड़चनों के कारण निर्माण शुरू नहीं हो सका। इसके बाद 13 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई बैठक के बाद इस परियोजना को नई रफ्तार मिली। केंद्र की तरफ से विद्युत घटक की लागत का 90 प्रतिशत तक वहन करने के आश्वासन के बाद 16 जनवरी 2017 को 'किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड' (KCL) का गठन किया गया। यह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सरकार का 50:50 की हिस्सेदारी वाला एक संयुक्त उपक्रम है, जिसे डीपीआर और तकनीकी अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
दिल्ली का जल संकट और विस्थापन की बड़ी चुनौती
यमुना के पुनर्जीवन और दिल्ली की प्यास बुझाने की रणनीति
मौजूदा समय में केंद्र सरकार का पूरा जोर यमुना नदी के प्रदूषण को कम करने, सालभर उसमें पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने और रिवर फ्रंट विकास को गति देने पर है। किशाऊ और लखवाड़ परियोजनाओं को इसी रणनीति का एक मुख्य हिस्सा माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना के पूर्ण होने के बाद यमुना में साफ पानी का बहाव बढ़ेगा जिससे देश की राजधानी दिल्ली के जल संकट को दूर करने में बड़ी मदद मिलेगी। अब तक इस योजना की राह में सबसे बड़ी बाधा जल, बिजली, लागत और पुनर्वास पैकेज को लेकर राज्यों का आपस में सहमत न होना था, जो गृह मंत्री की बैठक के बाद काफी हद तक सुलझ गई है।
डूब जाएंगे 17 गांव, 1000 परिवारों के विस्थापन का संकट
इस महत्वाकांक्षी परियोजना से जहां छह राज्यों को पानी और बिजली का व्यापक लाभ मिलने का दावा किया जा रहा है, वहीं इसके कारण एक बड़ी सामाजिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। अनुमानों के मुताबिक, इस विशाल बांध के निर्माण से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुल 17 गांव पूरी तरह से पानी में डूब जाएंगे। इससे करीब 1000 परिवारों को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ेगा। इस बांध के डूब क्षेत्र के लिए उत्तराखंड की लगभग 1452 हेक्टेयर और हिमाचल प्रदेश की 1498 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जाना प्रस्तावित है। इस जमीन के उपयोग के कारण उत्तराखंड के 9 गांव और हिमाचल प्रदेश के 8 गांव पूरी तरह जलमग्न क्षेत्र के दायरे में आ जाएंगे। ऐसे में स्थानीय निवासियों द्वारा उचित मुआवजे, पुनर्वास और अपनी आजीविका को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। हालांकि तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियां अभी भी सामने हैं, लेकिन राज्यों के बीच हुए इस हालिया समझौते ने 86 साल पुराने इस विजन को हकीकत के सबसे करीब ला दिया है।
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